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जीवों की विविधता (Diversity of the Living World)

जीवों की विविधता (Diversity of the Living World)

हमारी पृथ्वी(Earth) पर लाखों प्रकार के जीव-जंतु पाए जाते हैं, जो आकार, संरचना, जीवन शैली और निवास स्थान में भिन्न होते हैं। इस विविधता को "जीवों की विविधता" (Biodiversity) कहते हैं।

1. जीवों की विविधता के प्रकार:

  1. प्रजातियों की विविधता (Species Diversity) – विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु और पेड़-पौधे (जैसे:-बाघ, हाथी, आम का पेड़)।
  2. आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) – एक ही प्रजाति में पाए जाने वाले आनुवंशिक अंतर (जैसे:- अलग-अलग प्रकार की गेहूं की किस्में)।
  3. पारिस्थितिकी विविधता (Ecological Diversity) – विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्र (जैसे:- जंगल, रेगिस्तान, समुद्र)।

2. वर्गीकरण (Classification) का महत्व:

पृथ्वी पर जीवों की संख्या बहुत अधिक है, इसलिए वैज्ञानिकों ने इन्हें वर्गीकृत (Classify) किया है ताकि अध्ययन करना आसान हो सके।

  • अष्टांग वर्गीकरण (Eight-Taxon Classification):

    1. डोमेन (Domain)
    2. राज्य (Kingdom)
    3. संघ (Phylum) या गण (Division - Plants के लिए)
    4. वर्ग (Class)
    5. गण (Order)
    6. कुल (Family)
    7. वंश (Genus)
    8. जाति (Species)
  • पाँच जगत प्रणाली (Five Kingdom Classification - R.H. Whittaker द्वारा दी गई):

    1. मोनेरा (Monera) – बैक्टीरिया
    2. प्रोटिस्टा (Protista) – अमीबा, पैरामीशियम
    3. फंजाई (Fungi) – कवक (मशरूम, यीस्ट)
    4. प्लांटी (Plantae) – सभी पौधे
    5. ऐनिमेलिया (Animalia) – सभी जानवर

3. जीवों की विविधता का महत्व:

  • पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में सहायक है|
  • दवाइयों, भोजन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का स्रोत है|
  • पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता बनाए रखना है|

निष्कर्ष:-

जीवों की विविधता पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे संरक्षित करना बहुत जरूरी है ताकि सभी जीवों का अस्तित्व बना रहे।

क्रोमैटोग्राफी

क्रोमैटोग्राफी एक तकनीक है जो मिश्रण के अवयवों (components) को अलग करने और विश्लेषण करने के लिए उपयोग की जाती है। इसमें दो प्रमुख चरण होते हैं:

  1. स्थिर अवस्था (Stationary Phase) – यह ठोस या तरल हो सकती है, जिस पर मिश्रण रखा जाता है।
  2. गतिशील अवस्था (Mobile Phase) – यह एक तरल या गैस होती है, जो मिश्रण को स्थिर अवस्था के माध्यम से प्रवाहित करती है।

जब मिश्रण को गतिशील अवस्था के साथ प्रवाहित किया जाता है, तो उसके विभिन्न अवयव अलग-अलग गति से चलते हैं, जिससे वे अलग हो जाते हैं। क्रोमैटोग्राफी का उपयोग रसायन विज्ञान, औषधि निर्माण, खाद्य परीक्षण और फॉरेंसिक विज्ञान में किया जाता है।


मुख्य भाग:

  1. सॉल्वेंट (Solvent) – वह तरल जो मिश्रण को अलग करने के लिए इस्तेमाल होता है।
  2. क्रोमैटोग्राफी पेपर – जिस पर मिश्रण लगाया जाता है।
  3. ओरिजिनल स्पॉट (Original Spot) – मिश्रण का शुरुआती बिंदु, जहाँ सैंपल डाला जाता है।
  4. सेपरेटेड कंपोनेंट्स (Separated Components) – विभिन्न अवयव जो अलग-अलग ऊँचाई पर दिखाई देते हैं।
  5. सॉल्वेंट फ्रंट (Solvent Front) – वह बिंदु जहाँ तक सॉल्वेंट ऊपर चढ़ चुका होता है।

कैसे काम करता है?

  • मिश्रण को क्रोमैटोग्राफी पेपर पर एक बिंदु के रूप में लगाया जाता है।
  • पेपर को सॉल्वेंट में डुबोया जाता है, और जैसे-जैसे सॉल्वेंट ऊपर जाता है, वह मिश्रण के अलग-अलग अवयवों को अलग करता जाता है।
  • हल्के और घुलनशील अवयव ऊँचाई तक चले जाते हैं, जबकि भारी अवयव नीचे ही रहते हैं।