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Mechanism of Opening and Closing of Stomata

रन्ध्रो के खुलने एवं बन्द होने की क्रिया विधि [Mechanism of Opening and Closing of Stomata)

        रन्ध्रो का खुलना एवं बन्द होना, द्वार कोशिकाओं की स्फीति (hurpidity) पर निर्भर करता है। द्वार कोशिकाओं के स्फीत होने पर खुल जाते हैं तथा उनके शलथ (flaccid) होने पर बन्द हो जाते हैं। जब द्वार कोशिकाओं की परासरण सान्द्रता अधिक होती है तब इनमें संलग्न कोशिकाओं से अन्तः परासरण द्वारा जल प्रवेश करता है जिससे इनका स्फीति दाब (TP) बढ़ जाता है। यह बाहर की पतली भित्ति पर दबाव डालता है जिससे यह बहुत अधिक फैल जाती है। बाह्य भित्ति के बाहर की तरफ खिल जाने से अन्दर वाली मोटी भित्ति भी बाहर की ओर खिंच जाती है और रन्ध्र खुल जाता है। जब द्वार कोशिकाओं में स्फीति (turgidity) एवं स्फीति दाब (TP) कम होने लगता है तो वे शलथ (flaccid) हो जाती है, तब दोनों भित्तियाँ अपनी पूर्व अवस्था मैं आ जाती है और रन्ध्र बन्द हो जाता है। 
      रन्ध्रो के खुलने और बन्द होने को समझाने के लिए समय-समय पर विभिन्न मत (सिद्धान्त) प्रस्तुत किये गये हैं, जिसमें से कुछ मुख्य म निम्न प्रकार है—
      (1) प्रकाश - संश्लेषणी सिद्धान्न (Photosynthetic theory)- वॉन मोल (Von Mohl) के अनुसार, दिन में प्रकाश - संश्लेषण की क्रिया द्वारा द्वार अथवा रक्षक कोशिकाओं में शर्करा एकत्रित होती रहती है जिससे इनकी कोशिकाओं की सान्द्रता बढ़ जाती है तथा ये कोशिकाएँ अपनी समीपवर्ती कोशिकाओं से जल अवशोषित करके आशून (turgid) हो जाती है, अतः रन्ध्र खुल जाते हैं। रात में इसके विपरीत क्रिया होती है। रात मैं प्रकाश - संश्लेशण न होने के कारण शर्करा का निर्माण नहीं होता तथा जो बन चुकी है वह भी रात में उपयोग कर ली जाती है या फिर मण्ड (Starch) में परिवर्तित हो जाती है जिससे रक्षक कोशिका की सान्द्रता कम हो जाती है जिससे जल पास वाली कोशिकाओं से चला जाता है। अत: रन्ध्र बन्द हो जाते हैं। यह सिद्धान्त मान्य नहीं है, क्योंकि रक्षक कोशिकाओं के क्लोरोप्लास्ट या तो प्रकाश - संश्लेषण करने के लायक नहीं होते हैं अथवा बहुत कम प्रकाश - संश्लेषण करते हैं जिससे रक्षक कोशिका में आवश्यक सान्द्रता प्राप्त नहीं की जा सकती है।
      (2) लॉयड सिद्धान्त (Lloyd theory)- इस सिद्धान के अनुसार, द्वार कोशिकाओं में फॉस्फोराइलेज (phosphorylase) एंजाइम पाया जाता है जो अन्धकार में घुलित शर्कराओं को अघुलित (Insoluble) मण्ड में बदल देता है। अतः रक्षक कोशिकाओं का परासरण दाब (osmotic pressure) बढ़ नहीं पाता है। अतः रन्ध्र बन्द हो जाते हैं। लेकिन दिन के समय यह एन्जाइम अघुलित मण्ड को घुलित शर्करा में बदल देता है जिससे रक्षक कोशिकाओं का परासरण दाब बढ़ जाता है तथा रन्ध्र खुल जाते हैं।
       (3) स्कार्थ अथवा pH सिद्धान्त (Scarth or pH theory) — इस सिद्धान्त के अनुसार, द्वार कोशिकाओं में होने वाले मण्ड  @ शर्करा के परिवर्तन को नियन्त्रित करने वाला एन्जाइम इन कोशिकाओं के pH मान पर निर्भर करता है। इसके अनुसार, यदि द्वार कोशिका का pH अधिक (क्षारीय) होगा तो रन्ध्र खुल जाते हैं और यदि pH कम (अम्लीय) होगा तो रन्ध्र बन्द हो जायेंगे।
     (4) स्टीवर्ड सिद्धान्त (Steward theory)-स्टीवर्ड (Steward, 1964) ने उपर्युक्त सिद्धान्तों को आलोचना की। उनके अनुसार, "द्वार कोशिकाओं का परासरण दाब तब तक प्रभावित नहीं होगा, जब तक कि ग्लूकोज-1-फॉस्फेट आगे चलकर ग्लूकोज तथा अकार्बनिक फॉस्फेट में परिवर्तित नहीं हो जाता है। दूसरे, रन्ध्र मैं बन्द होने के लिए ऊर्जा (ATP) की आवश्यकता पड़ती है जो शायद श्वसन में प्राप्त होती है।" 
  
    सक्रिय पोटैशियम आयन (K+) परिवहन        सिद्धान्त [Active Potassium Ion (K+)      Transport Theory]

यह सिद्धान्त लेविट (Levitt, 1974) ने प्रस्तुत किया तथा राश्चक (Raschke, 1975) एवं बॉलिंग (Bowling, 1976) ने इसका विस्तारपूर्वक वर्णन किया। इस सिद्धान्त के अनुसार रन्ध्रों का खुलना एवं बन्द होना पोटैशियम आयनों का द्वार कोशिकाओं में अन्दर जाने और बाहर जाने पर निर्भर करता है। इस सिद्धान्त के आधार पर रन्ध्र के खुलने व बन्द होने की प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में समझाया जा सकता है —

(A) रन्ध्र के खुलने की प्रक्रिया (Mechanism of Stomatal Opening)

रन्ध्र खुलते समय अग्रलिखित क्रियाएँ होती हैं —     (1) प्रकाश की उपस्थिति में सर्वप्रथम द्वार कोशिकाओं में संचित मण्ड फॉस्फोइनोल पाइरुवेट (Phosphoenol pyruvate, PEP) में बदल जाता है।

   (2) फॉस्फोइनोल पाइरुवेट कार्बन डाइऑक्साइड से संयुक्त होकर ऑक्सेलोऐसीटिक अम्ल (oxaloacetic acid) बनाता है। यह अभिक्रिया फॉस्फोइनोल पाइरुवेट कार्बोक्सिलेज (PEP carboxylase) नामक एन्जाइम द्वारा उत्प्रेरित होती है। यह एन्जाइम अधिक pH होने पर सक्रिय हो जाता है। द्वार कोशिका की pH में बढ़ोतरी प्रकाश-संश्लेषण में CO2) के उपयोग हो जाने के कारण हो सकती है।
   (3) ऑक्सेलोऐसीटिक अम्ल मैलिक अम्ल में परिवर्तित हो जाता है।
   (4) मैलिक अम्ल द्वार कोशिकाओं में मैलेट (malate) आयन तथा H+ (प्रोटीन) में टूट जाता है।

   (5) प्रोटॉन (H+) द्वार कोशिकाओं से समीपवर्ती कोशिकाओं में चले जाते हैं तथा उनके स्थान पर पोटैशियम आयन द्वार कोशिकाओं में आ जाते हैं। इस क्रिया को आयन विनिमय (lon exchange) कहते हैं। 

   (6) आयन विनिमय (H+ == K+) एक सक्रिय क्रिया है जिसमें ऊर्जा व्यय होती है, जो या तो श्वसन से या फोटोफॉस्फोराइलेशन (photophosphorylation) से प्राप्त होती है।

   (7) पोटैशियम आयन मैलेट से क्रिया करके पोटैशियम मैलेट का निर्माण करते हैं, जो द्वार कोशिका की रिक्तिका में स्थानान्तरित हो जाता है। द्वार कोशिकाओं की pH को बनाये रखने हेतु कुछ क्लोराइड आयन (CI–) भी इनमें प्रवेश कर जाते हैं।

   (8) इसके फलस्वरूप द्वार कोशिकाओं का परासरण दाब (OP) बढ़ जाता है जिसके कारण समीपवर्ती कोशिकाओं से जल, अन्तःपरासरण द्वारा द्वार कोशिकाओं में आने लगता है।

   (9) जल अन्दर आने के कारण द्वार कोशिका में स्फीति दाब बढ़ता है। स्फीति दाब के बढ़ने पर रन्ध्र खुल जाते हैं।
(B) रन्ध्र के बन्द होने की प्रक्रिया (Mechanism of Stomatal Closing)

  रन्ध्र बन्द होते समय निम्नलिखित क्रियाएँ होती     है  —

(1) अन्धकार (रात्रि) में द्वार कोशिकाओं में कार्बन डाइऑक्साइड की सान्द्रता बढ़ जाती है, क्योंकि प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया रुक जाती है जबकि श्वसन की क्रिया होती रहती है, जिससे pH कम हो जाती है।

(2) pH कम होने पर एक संदमक हॉर्मोन एब्सिसिक अम्ल (Abscisic acid, ABA) कार्य करने लगता है, जो K+ आयन को आने से रोकता है तथा जो k+ आयन आ गए थे उन्हें वापस द्वार कोशिकाओं से समीपवर्ती कोशिकाओं में भेजता है।

3) एब्सिसिक अम्ल द्वार कोशिका के अम्लीय माध्यम को और अधिक अम्लीय कर देता है।
 
(4) माध्यम के अम्लीय होने से कार्बनिक अम्ल पुनः मण्ड में परिवर्तित हो जाते है, जिसके द्वार कोशिका की परासरण सान्द्रता कम हो जाती है, जिससे जल बहि: परासरण (exosmosis) द्वारा द्वार कोशिका से बाहर निकल जाता है। 

(5) द्वार कोशिका जब श्लथ हो जाती है तथा रंध्र बन्द हो जाते हैं।

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