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Mechanism of Transpiration

             वाष्पोत्सर्जन की क्रियाविधि                   (Mechanism of Transpiration) 
         मूल रोमों द्वारा अवशोषित जल पौधे के तने तथा पत्तियों तक पहुँच जाता है। पत्तियों की मीजोफिल कोशिकाएँ पानी को अवशोषित कर आशून तथा संतृप्त हो जाती हैं। इन कोशिकाओं की भित्तियों से जल वाष्प के रूप में अन्तराकोशिकीय अवकाशों (Intercellular spaces) में पहुँचता रहता है। सभी अन्तराकोशिकीय अवकाश आपस में एक-दूसरे से मिले रहते हैं, जो जल वाष्प से भर जाते हैं। सभी अन्तराकोशिकीय अवकाश उपरन्ध्रीय गुहा (Hypostomatal chamber) से मिले रहते हैं जिसके ठीक नीचे स्टोमेटा (stomata) स्थित रहते हैं।
          स्टोमेटा उपरन्ध्रीय गुहा तथा वायुमण्डल के बीच एक खिड़की (window) का कार्य करते हैं। जब वायुमण्डल का दाब उपरन्ध्रीय गुहा में निहित वाष्प से कम होता है तो जल वाष्प स्टोमेटा द्वारा विसरण के फलस्वरूप वाष्पोत्सर्जन के समय बाहर निकल जाती है। रन्ध्री वाष्पोत्सर्जन स्टोमेटा के खुले रहने तक होता रहेगा।  
          वतरंध्री वाष्पोत्सर्जन की क्रियाविधि भी रन्ध्री वाष्पोत्सर्जन के समान ही होती है। 
       उपत्वचा (Cuticle) जल के प्रति अधिक पारगम्य नहीं होती है। फिर भी इसके (उपत्वचा) अणु बाह्यत्वचा की कोशिकाओं से अन्तःचूषण अथवा अन्त : - शोषण द्वारा जल का अवशोषण करते हैं। यह अन्तः चूषित जल वातावरण में जलवाष्प की कमी होने के कारण धीरे-धीरे बाहर निकल जाता है। उपत्वचा की मोटाई बढ़ने पर अन्तःचूषण कम हो जाता है अतः मोटी उपत्वचा द्वारा वाष्पोत्सर्जन की क्रिया नहीं होती है। उपत्वचा दिन के समय सिकुड़ कर मोटी हो जाती है तथा रात्रि में फैलकर ढीली हो जाती है, अतः उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन की दर रात्रि में अधिक होती है।

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