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Diffusion in plants personalizedAds: false,

Synopsis
1.Diffusion
2.diffusion pressure
3.factors affecting rate of diffusion
4.significance of diffusion in plants
5. Conclusion 

( 1.) विसरण [Diffusion] 
      " किसी ठोस, द्रव या गैस के अणुओं या आयनो का अधिक सांद्रता वाले क्षेत्र से कम सांद्रता वाले क्षेत्र की ओर गमन विसरण कहलाता है।" 
      अगरबत्ती की खुशबू का पूरे कमरे में फैल जाना, शक्कर का पानी में घुलना, लाल दवा (KMnO4) का पानी में डालने पर उसका जल में घुलकर फैलना, प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया में CO2 को वातावरण से लेना तथा O2 का निकालना आदि सभी विसरण के उदाहरण हैं। गैस, द्रव तथा ठोस पदार्थ के कण एक-दूसरे में भी विसरित (diffuse) होते हैं। विसरण की दर गैसों में सबसे अधिक, द्रवों में गैसों से कम तथा विलेय (ठोस) को विलायक (द्रव) में घोलने पर द्रवों से अपेक्षाकृत कम होती है।
         एक ही तन्त्र में उपस्थित दो या अधिक पदार्थों के अणुओं के विसरण की दिशा व गति एक-दूसरे पर निर्भर नहीं करती है अर्थात् किसी भी तन्त्र में विभिन्न प्रकार के अणुओं का विसरण अपने ही अणुओं की सान्द्रता पर निर्भर करता है।
       उदाहरण के लिए, किसी पानी से भरे बीकर में, यदि नमक और चीनी के कण एक साथ डाले जायें तो दोनों स्वतन्त्र रूप से पानी में विसरित हो जायेंगे। किन्तु यह तभी होगा जब ये पदार्थ एक-दूसरे से रासायनिक क्रिया न करते हों। इन दोनों पदार्थों के विसरित होने की गतियाँ भिन्न-भिन्न होंगी, किन्तु अन्त में एक ऐसी अवस्था आ जायेगी जब घोल अथवा विलयन (solution) के प्रत्येक भाग में नमक की सान्द्रता समान होगी और चीनी की भी सान्द्रता घोल के प्रत्येक भाग में समान होगी, परन्तु दोनों पदार्थों की सान्द्रताएँ एक-दूसरे से भिन्न होंगी, क्योंकि यह प्रत्येक पदार्थ के कुल कितने अणु पानी में डाले गये हैं, इस पर निर्भर करता है। विसरण की इस विशेषता को स्वतन्त्र विसरण का नियम (Principle of independent diffusion) कहते हैं।
       
         विसरण को निम्नलिखित तीन उदाहरणों की सहायता से समझाया जा सकता है—

(1) जब कॉपर सल्फेट (CuSO4) का एक टुकड़ा पानी से भरे बीकर में रखा जाता है, तो कुछ समय बाद कॉपर सल्फेट के टुकड़े के चारों ओर का पानी नीले रंग का हो जाता है क्योंकि कॉपर सल्फेट के अणु सभी दिशाओं में तब तक विसरण करते हैं जब तक कि ये बीकर के पानी में समान रूप से विसरित न हो जायें तथा सम्पूर्ण पानी का रंग समान रूप से नीला न हो जाये।
     (2) कोशिका झिल्ली एक छिद्रयुक्त (porous) झिल्ली है, जिसमें असंख्य छोटे-छोटे छिद्र पाये जाते हैं। ये 7Å-10Å व्यास वाले होते हैं। ये छिद्र कुछ विशिष्ट प्रोटीन अणुओं के द्वारा बनते हैं तथा इनमें कुछ छिद्र धनावेशित तथा कुछ छिद्र ऋण आवेशित होते हैं। ये छिद्र या तो हमेशा खुले रहते हैं अथवा ये छिद्र एक वाल्व की तरह कार्य करते हैं तथा तभी खुलते हैं जब इनकी आवश्यकता होती है। अनेक प्रकार के आयन्स; जैसे—K+, C1-, HCO3- इत्यादि इन छिद्रों में विद्युत- रासायनिक प्रवणता के अनुसार प्रवेश करते हैं।
    (3) किसी तन्त्र में किसी एक गैस के विसरण दाब को आंशिक दाब (partial pressure) कहते हैं। गैस हमेशा उच्च आंशिक दाब के क्षेत्र से निम्न आंशिक दाब के क्षेत्र की ओर विसरण करती है; जैसे—ऊतक श्वसन में गैसों का आदान-प्रदान।
       उपर्युक्त तीनों उदाहरणों से यह निष्कर्ष निकलता है कि विद्युत-अनपघट्य (non-electrolyte) के अणुओं का विसरण सान्द्रण प्रवणता के अनुसार, विद्युत- अपघट्य (electrolyte) के अणुओं या आयनों का विसरण विद्युत-रासायनिक प्रवणता के अनुसार एवं गैसों का विसरण आंशिक दाब के अनुसार होता है। 

( 2.) विसरण दाब [Diffusion Pressure= DP] 
       विसरण करने वाले अणु या आयन्स द्वारा उत्पन्न दाब, विसरण दाब (DP) कहलाता है। इसे निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है—
       विसरण दाब (DP), विसरित कणों की संख्या के समानुपाती होता है अर्थात् किसी तन्त्र में प्रसरण करने वाले कणों की सान्द्रता अधिक होती है तो उनका विसरण दाब भी अधिक होगा तथा सान्द्रता कम होने पर यह दाब भी कम हो जाएगा।

( 3.) विसरण दर को प्रभावित करने वाले              कारक [Factors Affecting Rate of          Diffusion]

    (1) तापमान (Temperature) – तापमान के बढ़ने पर विसरण दर में वृद्धि होती है, क्योंकि तापमान के बढ़ने से विसरण करने वाले कणों को गतिज ऊर्जा (motion energy) बढ़ जाती है।
      (2) विसरण करने वाले पदार्थ का घनत्व (Density of Diffusing Substance) - विसरण की दर विसरण करने वाले पदार्थ के घनत्व के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती (inversely proportional) होती है।

D = विसरण, d = घनत्व

     यह ग्राहम का विसरण नियम (Graham's law of diffusion) कहलाता है जिसके अनुसार यदि विसरण कणों का घनत्व अधिक होता है तो उनकी विसरण दर कम होती है।
      (3) माध्यम जिसमें विसरण होता है (Medium in which diffusion occurs) - अधिक सान्द्र माध्यम में विसरण गति कम होती है।
      (4) प्रसरण दाब ग्रेडिएन्ट (Diffusion Pressure Gradient) - यह किसी विशिष्ट दूरी का सान्द्रता अन्तर होता है। अतः इसके अधिक होने पर विसरण अधिक गति से होता है।

( 4.) पादपों में विसरण का महत्त्व [Significance of Diffusion in Plants
    
     (1) पादपों में प्रकाश-संश्लेषण के समय CO2 तथा O2 श्वसन के समय O2 तथा CO2 गैसों का आदान-प्रदान स्वतन्त्र विसरण के अनुसार होता है।
    (2) वाष्पोत्सर्जन में जल - वाष्प हानि विसरण द्वारा होती है। 
    (3) निष्क्रिय (Passive) लवण अन्तर्ग्रहण के समय आयन्स विसरण द्वारा अवशोषित होते हैं। 
    (4) भोज्य पदार्थों का स्थानान्तरण विसरण द्वारा होता है।

( 5.) पादपों में जल का अवशोषण एवं गति [Absorption and Movement of Water in Plants]

       जल पादपों का एक बहुत महत्त्वपूर्ण घटक है तथा इनकी जैविक क्रियाओं के लिए अनिवार्य है। पादप वाष्पोत्सर्जन की क्रिया द्वारा जल की बहुत अधिक मात्रा में हानि करते हैं। अतः पादपों को जल की इस हानि की पूर्ति (भरपाई) अपने को मुरझाने से रोकने के लिए करनी पड़ती है। जल मुख्यतः पौधे की जड़ो द्वारा मृदा से अवशोषित किया जाता है जहाँ से यह ऊपर की और विभिन्न भागों को जाता है और अन्ततः पौधे के वायवीय भागों, विशेषकर पत्तियों द्वारा जल वाष्प के रूप में इसकी हानि होती है। पादपों में जल का अवशोषण एवं गति की जटिल क्रिया-विधि को समझाने के लिए, अनेक भौतिक-रासायनिक विधियों (physico-chemical processes); जैसे—विसरण (diffusion), पारगम्यता (permeability), परासरण (osmosis), जल विभव (water potential), जीवद्रव्यकुंचन (plasmolysis) एवं अन्त: चूषण (imbibition) का, जो इस क्रिया-विधि में भाग लेती हैं, समझना आवश्यक है।
5. Conclusion -कोशिकाओं के लिए प्रसार महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उन्हें ऊर्जा प्राप्त करने और बढ़ने के लिए आवश्यक उपयोगी पदार्थों को प्राप्त करने की अनुमति देता है, और उन्हें अपशिष्ट उत्पादों से छुटकारा पाने देता है।

Stomatal Transpiration and structure of stomata

वाष्पोत्सर्जन का तात्पर्य सामान्यतः रन्ध्री वाष्पोत्सर्जन से ही होता है। अतः इसका वर्णन नीचे विस्तार से किया गया है—

         रन्ध्र की संरचना (Structure of                                            Stomata)

हरे तनों तथा पत्तियों की बाह्यत्वचा पर अनेक छोटे-छोटे छिद्र पाये जाते हैं, जिन्हें रन्ध्र (stomata) कहते हैं। प्रत्येक छिद्र दो वृक्काकार (kidney shaped) द्वार अथवा रक्षक कोशिकाओं (guard cells) से घिरारहता है। द्वार कोशिकाओं की अन्दर (छिद्र की ओर) की भित्ति मोटी एवं स्थिर (non - elastic) तथा बाहर की भित्ति पतली एवं लचीली (elastic) होती है। द्वार कोशिकाओं को चारों ओर से बाह्यत्वचीय कोशिकाएँ घेरे रहती हैं, इन्हें सहायक कोशिकाएँ (subsidiary or accessory cells) कहते हैं।

        रन्धों का वितरण (Distribution of                                         Stomata)

पत्तियों में वितरण व्यवस्था के आधार पर रन्ध्र निम्नलिखित पाँच प्रकार के होते हैं —

(1) सेब तथा शहतूत प्रकार (Apple and mulberry type)- रन्ध्र केवल निचली सतह पर पाये जाते हैं; जैसे- सेब, शहतूत आदि। इस प्रकार की पत्ती को अधोरन्ध्री (hypostomatic) कहा जाता है। 
(2) आलू प्रकार (Potato type)- रन्ध्र दोनों सतहों पर पाये जाते हैं, लेकिन निचली सतह पर ऊपरी सतह की तुलना में अधिक होते हैं; जैसे-आलू, टमाटर आदि । इस प्रकार की पत्ती को उभयरन्ध्री (amphistomatic) कहा जाता है।
(3) जई प्रकार (Oat type)- रन्ध्र दोनों सतहों पर लगभग समान संख्या में पाये जाते हैं; जैसे — जई, गेहूँ आदि। इस प्रकार की पत्ती को भी उभयरन्ध्री कहा जाता है।
(4) वाटरलिली प्रकार (Waterlily type)- रन्ध्र केवल ऊपरी सतह पर ही पाये जाते हैं; जैसे— वाटरलिली, निम्फिया (Nymphaea) आदि इस प्रकार की पत्ती को अधिरन्ध्री (epistomatic) कहा जाता है।
(5) पोटेमोजीटोन प्रकार (Potamogeton type)- रन्ध्र या तो अनुपस्थित या कार्यहीन (non functional) होते हैं; जैसे—पोटेमोजीटोन (Potamogeton) तथा अन्य जलनिमग्न जातियाँ।