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Diffusion in plants personalizedAds: false,

Synopsis
1.Diffusion
2.diffusion pressure
3.factors affecting rate of diffusion
4.significance of diffusion in plants
5. Conclusion 

( 1.) विसरण [Diffusion] 
      " किसी ठोस, द्रव या गैस के अणुओं या आयनो का अधिक सांद्रता वाले क्षेत्र से कम सांद्रता वाले क्षेत्र की ओर गमन विसरण कहलाता है।" 
      अगरबत्ती की खुशबू का पूरे कमरे में फैल जाना, शक्कर का पानी में घुलना, लाल दवा (KMnO4) का पानी में डालने पर उसका जल में घुलकर फैलना, प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया में CO2 को वातावरण से लेना तथा O2 का निकालना आदि सभी विसरण के उदाहरण हैं। गैस, द्रव तथा ठोस पदार्थ के कण एक-दूसरे में भी विसरित (diffuse) होते हैं। विसरण की दर गैसों में सबसे अधिक, द्रवों में गैसों से कम तथा विलेय (ठोस) को विलायक (द्रव) में घोलने पर द्रवों से अपेक्षाकृत कम होती है।
         एक ही तन्त्र में उपस्थित दो या अधिक पदार्थों के अणुओं के विसरण की दिशा व गति एक-दूसरे पर निर्भर नहीं करती है अर्थात् किसी भी तन्त्र में विभिन्न प्रकार के अणुओं का विसरण अपने ही अणुओं की सान्द्रता पर निर्भर करता है।
       उदाहरण के लिए, किसी पानी से भरे बीकर में, यदि नमक और चीनी के कण एक साथ डाले जायें तो दोनों स्वतन्त्र रूप से पानी में विसरित हो जायेंगे। किन्तु यह तभी होगा जब ये पदार्थ एक-दूसरे से रासायनिक क्रिया न करते हों। इन दोनों पदार्थों के विसरित होने की गतियाँ भिन्न-भिन्न होंगी, किन्तु अन्त में एक ऐसी अवस्था आ जायेगी जब घोल अथवा विलयन (solution) के प्रत्येक भाग में नमक की सान्द्रता समान होगी और चीनी की भी सान्द्रता घोल के प्रत्येक भाग में समान होगी, परन्तु दोनों पदार्थों की सान्द्रताएँ एक-दूसरे से भिन्न होंगी, क्योंकि यह प्रत्येक पदार्थ के कुल कितने अणु पानी में डाले गये हैं, इस पर निर्भर करता है। विसरण की इस विशेषता को स्वतन्त्र विसरण का नियम (Principle of independent diffusion) कहते हैं।
       
         विसरण को निम्नलिखित तीन उदाहरणों की सहायता से समझाया जा सकता है—

(1) जब कॉपर सल्फेट (CuSO4) का एक टुकड़ा पानी से भरे बीकर में रखा जाता है, तो कुछ समय बाद कॉपर सल्फेट के टुकड़े के चारों ओर का पानी नीले रंग का हो जाता है क्योंकि कॉपर सल्फेट के अणु सभी दिशाओं में तब तक विसरण करते हैं जब तक कि ये बीकर के पानी में समान रूप से विसरित न हो जायें तथा सम्पूर्ण पानी का रंग समान रूप से नीला न हो जाये।
     (2) कोशिका झिल्ली एक छिद्रयुक्त (porous) झिल्ली है, जिसमें असंख्य छोटे-छोटे छिद्र पाये जाते हैं। ये 7Å-10Å व्यास वाले होते हैं। ये छिद्र कुछ विशिष्ट प्रोटीन अणुओं के द्वारा बनते हैं तथा इनमें कुछ छिद्र धनावेशित तथा कुछ छिद्र ऋण आवेशित होते हैं। ये छिद्र या तो हमेशा खुले रहते हैं अथवा ये छिद्र एक वाल्व की तरह कार्य करते हैं तथा तभी खुलते हैं जब इनकी आवश्यकता होती है। अनेक प्रकार के आयन्स; जैसे—K+, C1-, HCO3- इत्यादि इन छिद्रों में विद्युत- रासायनिक प्रवणता के अनुसार प्रवेश करते हैं।
    (3) किसी तन्त्र में किसी एक गैस के विसरण दाब को आंशिक दाब (partial pressure) कहते हैं। गैस हमेशा उच्च आंशिक दाब के क्षेत्र से निम्न आंशिक दाब के क्षेत्र की ओर विसरण करती है; जैसे—ऊतक श्वसन में गैसों का आदान-प्रदान।
       उपर्युक्त तीनों उदाहरणों से यह निष्कर्ष निकलता है कि विद्युत-अनपघट्य (non-electrolyte) के अणुओं का विसरण सान्द्रण प्रवणता के अनुसार, विद्युत- अपघट्य (electrolyte) के अणुओं या आयनों का विसरण विद्युत-रासायनिक प्रवणता के अनुसार एवं गैसों का विसरण आंशिक दाब के अनुसार होता है। 

( 2.) विसरण दाब [Diffusion Pressure= DP] 
       विसरण करने वाले अणु या आयन्स द्वारा उत्पन्न दाब, विसरण दाब (DP) कहलाता है। इसे निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है—
       विसरण दाब (DP), विसरित कणों की संख्या के समानुपाती होता है अर्थात् किसी तन्त्र में प्रसरण करने वाले कणों की सान्द्रता अधिक होती है तो उनका विसरण दाब भी अधिक होगा तथा सान्द्रता कम होने पर यह दाब भी कम हो जाएगा।

( 3.) विसरण दर को प्रभावित करने वाले              कारक [Factors Affecting Rate of          Diffusion]

    (1) तापमान (Temperature) – तापमान के बढ़ने पर विसरण दर में वृद्धि होती है, क्योंकि तापमान के बढ़ने से विसरण करने वाले कणों को गतिज ऊर्जा (motion energy) बढ़ जाती है।
      (2) विसरण करने वाले पदार्थ का घनत्व (Density of Diffusing Substance) - विसरण की दर विसरण करने वाले पदार्थ के घनत्व के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती (inversely proportional) होती है।

D = विसरण, d = घनत्व

     यह ग्राहम का विसरण नियम (Graham's law of diffusion) कहलाता है जिसके अनुसार यदि विसरण कणों का घनत्व अधिक होता है तो उनकी विसरण दर कम होती है।
      (3) माध्यम जिसमें विसरण होता है (Medium in which diffusion occurs) - अधिक सान्द्र माध्यम में विसरण गति कम होती है।
      (4) प्रसरण दाब ग्रेडिएन्ट (Diffusion Pressure Gradient) - यह किसी विशिष्ट दूरी का सान्द्रता अन्तर होता है। अतः इसके अधिक होने पर विसरण अधिक गति से होता है।

( 4.) पादपों में विसरण का महत्त्व [Significance of Diffusion in Plants
    
     (1) पादपों में प्रकाश-संश्लेषण के समय CO2 तथा O2 श्वसन के समय O2 तथा CO2 गैसों का आदान-प्रदान स्वतन्त्र विसरण के अनुसार होता है।
    (2) वाष्पोत्सर्जन में जल - वाष्प हानि विसरण द्वारा होती है। 
    (3) निष्क्रिय (Passive) लवण अन्तर्ग्रहण के समय आयन्स विसरण द्वारा अवशोषित होते हैं। 
    (4) भोज्य पदार्थों का स्थानान्तरण विसरण द्वारा होता है।

( 5.) पादपों में जल का अवशोषण एवं गति [Absorption and Movement of Water in Plants]

       जल पादपों का एक बहुत महत्त्वपूर्ण घटक है तथा इनकी जैविक क्रियाओं के लिए अनिवार्य है। पादप वाष्पोत्सर्जन की क्रिया द्वारा जल की बहुत अधिक मात्रा में हानि करते हैं। अतः पादपों को जल की इस हानि की पूर्ति (भरपाई) अपने को मुरझाने से रोकने के लिए करनी पड़ती है। जल मुख्यतः पौधे की जड़ो द्वारा मृदा से अवशोषित किया जाता है जहाँ से यह ऊपर की और विभिन्न भागों को जाता है और अन्ततः पौधे के वायवीय भागों, विशेषकर पत्तियों द्वारा जल वाष्प के रूप में इसकी हानि होती है। पादपों में जल का अवशोषण एवं गति की जटिल क्रिया-विधि को समझाने के लिए, अनेक भौतिक-रासायनिक विधियों (physico-chemical processes); जैसे—विसरण (diffusion), पारगम्यता (permeability), परासरण (osmosis), जल विभव (water potential), जीवद्रव्यकुंचन (plasmolysis) एवं अन्त: चूषण (imbibition) का, जो इस क्रिया-विधि में भाग लेती हैं, समझना आवश्यक है।
5. Conclusion -कोशिकाओं के लिए प्रसार महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उन्हें ऊर्जा प्राप्त करने और बढ़ने के लिए आवश्यक उपयोगी पदार्थों को प्राप्त करने की अनुमति देता है, और उन्हें अपशिष्ट उत्पादों से छुटकारा पाने देता है।

Stomatal Transpiration and structure of stomata

वाष्पोत्सर्जन का तात्पर्य सामान्यतः रन्ध्री वाष्पोत्सर्जन से ही होता है। अतः इसका वर्णन नीचे विस्तार से किया गया है—

         रन्ध्र की संरचना (Structure of                                            Stomata)

हरे तनों तथा पत्तियों की बाह्यत्वचा पर अनेक छोटे-छोटे छिद्र पाये जाते हैं, जिन्हें रन्ध्र (stomata) कहते हैं। प्रत्येक छिद्र दो वृक्काकार (kidney shaped) द्वार अथवा रक्षक कोशिकाओं (guard cells) से घिरारहता है। द्वार कोशिकाओं की अन्दर (छिद्र की ओर) की भित्ति मोटी एवं स्थिर (non - elastic) तथा बाहर की भित्ति पतली एवं लचीली (elastic) होती है। द्वार कोशिकाओं को चारों ओर से बाह्यत्वचीय कोशिकाएँ घेरे रहती हैं, इन्हें सहायक कोशिकाएँ (subsidiary or accessory cells) कहते हैं।

        रन्धों का वितरण (Distribution of                                         Stomata)

पत्तियों में वितरण व्यवस्था के आधार पर रन्ध्र निम्नलिखित पाँच प्रकार के होते हैं —

(1) सेब तथा शहतूत प्रकार (Apple and mulberry type)- रन्ध्र केवल निचली सतह पर पाये जाते हैं; जैसे- सेब, शहतूत आदि। इस प्रकार की पत्ती को अधोरन्ध्री (hypostomatic) कहा जाता है। 
(2) आलू प्रकार (Potato type)- रन्ध्र दोनों सतहों पर पाये जाते हैं, लेकिन निचली सतह पर ऊपरी सतह की तुलना में अधिक होते हैं; जैसे-आलू, टमाटर आदि । इस प्रकार की पत्ती को उभयरन्ध्री (amphistomatic) कहा जाता है।
(3) जई प्रकार (Oat type)- रन्ध्र दोनों सतहों पर लगभग समान संख्या में पाये जाते हैं; जैसे — जई, गेहूँ आदि। इस प्रकार की पत्ती को भी उभयरन्ध्री कहा जाता है।
(4) वाटरलिली प्रकार (Waterlily type)- रन्ध्र केवल ऊपरी सतह पर ही पाये जाते हैं; जैसे— वाटरलिली, निम्फिया (Nymphaea) आदि इस प्रकार की पत्ती को अधिरन्ध्री (epistomatic) कहा जाता है।
(5) पोटेमोजीटोन प्रकार (Potamogeton type)- रन्ध्र या तो अनुपस्थित या कार्यहीन (non functional) होते हैं; जैसे—पोटेमोजीटोन (Potamogeton) तथा अन्य जलनिमग्न जातियाँ।

Mechanism of Transpiration

             वाष्पोत्सर्जन की क्रियाविधि                   (Mechanism of Transpiration) 
         मूल रोमों द्वारा अवशोषित जल पौधे के तने तथा पत्तियों तक पहुँच जाता है। पत्तियों की मीजोफिल कोशिकाएँ पानी को अवशोषित कर आशून तथा संतृप्त हो जाती हैं। इन कोशिकाओं की भित्तियों से जल वाष्प के रूप में अन्तराकोशिकीय अवकाशों (Intercellular spaces) में पहुँचता रहता है। सभी अन्तराकोशिकीय अवकाश आपस में एक-दूसरे से मिले रहते हैं, जो जल वाष्प से भर जाते हैं। सभी अन्तराकोशिकीय अवकाश उपरन्ध्रीय गुहा (Hypostomatal chamber) से मिले रहते हैं जिसके ठीक नीचे स्टोमेटा (stomata) स्थित रहते हैं।
          स्टोमेटा उपरन्ध्रीय गुहा तथा वायुमण्डल के बीच एक खिड़की (window) का कार्य करते हैं। जब वायुमण्डल का दाब उपरन्ध्रीय गुहा में निहित वाष्प से कम होता है तो जल वाष्प स्टोमेटा द्वारा विसरण के फलस्वरूप वाष्पोत्सर्जन के समय बाहर निकल जाती है। रन्ध्री वाष्पोत्सर्जन स्टोमेटा के खुले रहने तक होता रहेगा।  
          वतरंध्री वाष्पोत्सर्जन की क्रियाविधि भी रन्ध्री वाष्पोत्सर्जन के समान ही होती है। 
       उपत्वचा (Cuticle) जल के प्रति अधिक पारगम्य नहीं होती है। फिर भी इसके (उपत्वचा) अणु बाह्यत्वचा की कोशिकाओं से अन्तःचूषण अथवा अन्त : - शोषण द्वारा जल का अवशोषण करते हैं। यह अन्तः चूषित जल वातावरण में जलवाष्प की कमी होने के कारण धीरे-धीरे बाहर निकल जाता है। उपत्वचा की मोटाई बढ़ने पर अन्तःचूषण कम हो जाता है अतः मोटी उपत्वचा द्वारा वाष्पोत्सर्जन की क्रिया नहीं होती है। उपत्वचा दिन के समय सिकुड़ कर मोटी हो जाती है तथा रात्रि में फैलकर ढीली हो जाती है, अतः उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन की दर रात्रि में अधिक होती है।

Mechanism of Opening and Closing of Stomata

रन्ध्रो के खुलने एवं बन्द होने की क्रिया विधि [Mechanism of Opening and Closing of Stomata)

        रन्ध्रो का खुलना एवं बन्द होना, द्वार कोशिकाओं की स्फीति (hurpidity) पर निर्भर करता है। द्वार कोशिकाओं के स्फीत होने पर खुल जाते हैं तथा उनके शलथ (flaccid) होने पर बन्द हो जाते हैं। जब द्वार कोशिकाओं की परासरण सान्द्रता अधिक होती है तब इनमें संलग्न कोशिकाओं से अन्तः परासरण द्वारा जल प्रवेश करता है जिससे इनका स्फीति दाब (TP) बढ़ जाता है। यह बाहर की पतली भित्ति पर दबाव डालता है जिससे यह बहुत अधिक फैल जाती है। बाह्य भित्ति के बाहर की तरफ खिल जाने से अन्दर वाली मोटी भित्ति भी बाहर की ओर खिंच जाती है और रन्ध्र खुल जाता है। जब द्वार कोशिकाओं में स्फीति (turgidity) एवं स्फीति दाब (TP) कम होने लगता है तो वे शलथ (flaccid) हो जाती है, तब दोनों भित्तियाँ अपनी पूर्व अवस्था मैं आ जाती है और रन्ध्र बन्द हो जाता है। 
      रन्ध्रो के खुलने और बन्द होने को समझाने के लिए समय-समय पर विभिन्न मत (सिद्धान्त) प्रस्तुत किये गये हैं, जिसमें से कुछ मुख्य म निम्न प्रकार है—
      (1) प्रकाश - संश्लेषणी सिद्धान्न (Photosynthetic theory)- वॉन मोल (Von Mohl) के अनुसार, दिन में प्रकाश - संश्लेषण की क्रिया द्वारा द्वार अथवा रक्षक कोशिकाओं में शर्करा एकत्रित होती रहती है जिससे इनकी कोशिकाओं की सान्द्रता बढ़ जाती है तथा ये कोशिकाएँ अपनी समीपवर्ती कोशिकाओं से जल अवशोषित करके आशून (turgid) हो जाती है, अतः रन्ध्र खुल जाते हैं। रात में इसके विपरीत क्रिया होती है। रात मैं प्रकाश - संश्लेशण न होने के कारण शर्करा का निर्माण नहीं होता तथा जो बन चुकी है वह भी रात में उपयोग कर ली जाती है या फिर मण्ड (Starch) में परिवर्तित हो जाती है जिससे रक्षक कोशिका की सान्द्रता कम हो जाती है जिससे जल पास वाली कोशिकाओं से चला जाता है। अत: रन्ध्र बन्द हो जाते हैं। यह सिद्धान्त मान्य नहीं है, क्योंकि रक्षक कोशिकाओं के क्लोरोप्लास्ट या तो प्रकाश - संश्लेषण करने के लायक नहीं होते हैं अथवा बहुत कम प्रकाश - संश्लेषण करते हैं जिससे रक्षक कोशिका में आवश्यक सान्द्रता प्राप्त नहीं की जा सकती है।
      (2) लॉयड सिद्धान्त (Lloyd theory)- इस सिद्धान के अनुसार, द्वार कोशिकाओं में फॉस्फोराइलेज (phosphorylase) एंजाइम पाया जाता है जो अन्धकार में घुलित शर्कराओं को अघुलित (Insoluble) मण्ड में बदल देता है। अतः रक्षक कोशिकाओं का परासरण दाब (osmotic pressure) बढ़ नहीं पाता है। अतः रन्ध्र बन्द हो जाते हैं। लेकिन दिन के समय यह एन्जाइम अघुलित मण्ड को घुलित शर्करा में बदल देता है जिससे रक्षक कोशिकाओं का परासरण दाब बढ़ जाता है तथा रन्ध्र खुल जाते हैं।
       (3) स्कार्थ अथवा pH सिद्धान्त (Scarth or pH theory) — इस सिद्धान्त के अनुसार, द्वार कोशिकाओं में होने वाले मण्ड  @ शर्करा के परिवर्तन को नियन्त्रित करने वाला एन्जाइम इन कोशिकाओं के pH मान पर निर्भर करता है। इसके अनुसार, यदि द्वार कोशिका का pH अधिक (क्षारीय) होगा तो रन्ध्र खुल जाते हैं और यदि pH कम (अम्लीय) होगा तो रन्ध्र बन्द हो जायेंगे।
     (4) स्टीवर्ड सिद्धान्त (Steward theory)-स्टीवर्ड (Steward, 1964) ने उपर्युक्त सिद्धान्तों को आलोचना की। उनके अनुसार, "द्वार कोशिकाओं का परासरण दाब तब तक प्रभावित नहीं होगा, जब तक कि ग्लूकोज-1-फॉस्फेट आगे चलकर ग्लूकोज तथा अकार्बनिक फॉस्फेट में परिवर्तित नहीं हो जाता है। दूसरे, रन्ध्र मैं बन्द होने के लिए ऊर्जा (ATP) की आवश्यकता पड़ती है जो शायद श्वसन में प्राप्त होती है।" 
  
    सक्रिय पोटैशियम आयन (K+) परिवहन        सिद्धान्त [Active Potassium Ion (K+)      Transport Theory]

यह सिद्धान्त लेविट (Levitt, 1974) ने प्रस्तुत किया तथा राश्चक (Raschke, 1975) एवं बॉलिंग (Bowling, 1976) ने इसका विस्तारपूर्वक वर्णन किया। इस सिद्धान्त के अनुसार रन्ध्रों का खुलना एवं बन्द होना पोटैशियम आयनों का द्वार कोशिकाओं में अन्दर जाने और बाहर जाने पर निर्भर करता है। इस सिद्धान्त के आधार पर रन्ध्र के खुलने व बन्द होने की प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में समझाया जा सकता है —

(A) रन्ध्र के खुलने की प्रक्रिया (Mechanism of Stomatal Opening)

रन्ध्र खुलते समय अग्रलिखित क्रियाएँ होती हैं —     (1) प्रकाश की उपस्थिति में सर्वप्रथम द्वार कोशिकाओं में संचित मण्ड फॉस्फोइनोल पाइरुवेट (Phosphoenol pyruvate, PEP) में बदल जाता है।

   (2) फॉस्फोइनोल पाइरुवेट कार्बन डाइऑक्साइड से संयुक्त होकर ऑक्सेलोऐसीटिक अम्ल (oxaloacetic acid) बनाता है। यह अभिक्रिया फॉस्फोइनोल पाइरुवेट कार्बोक्सिलेज (PEP carboxylase) नामक एन्जाइम द्वारा उत्प्रेरित होती है। यह एन्जाइम अधिक pH होने पर सक्रिय हो जाता है। द्वार कोशिका की pH में बढ़ोतरी प्रकाश-संश्लेषण में CO2) के उपयोग हो जाने के कारण हो सकती है।
   (3) ऑक्सेलोऐसीटिक अम्ल मैलिक अम्ल में परिवर्तित हो जाता है।
   (4) मैलिक अम्ल द्वार कोशिकाओं में मैलेट (malate) आयन तथा H+ (प्रोटीन) में टूट जाता है।

   (5) प्रोटॉन (H+) द्वार कोशिकाओं से समीपवर्ती कोशिकाओं में चले जाते हैं तथा उनके स्थान पर पोटैशियम आयन द्वार कोशिकाओं में आ जाते हैं। इस क्रिया को आयन विनिमय (lon exchange) कहते हैं। 

   (6) आयन विनिमय (H+ == K+) एक सक्रिय क्रिया है जिसमें ऊर्जा व्यय होती है, जो या तो श्वसन से या फोटोफॉस्फोराइलेशन (photophosphorylation) से प्राप्त होती है।

   (7) पोटैशियम आयन मैलेट से क्रिया करके पोटैशियम मैलेट का निर्माण करते हैं, जो द्वार कोशिका की रिक्तिका में स्थानान्तरित हो जाता है। द्वार कोशिकाओं की pH को बनाये रखने हेतु कुछ क्लोराइड आयन (CI–) भी इनमें प्रवेश कर जाते हैं।

   (8) इसके फलस्वरूप द्वार कोशिकाओं का परासरण दाब (OP) बढ़ जाता है जिसके कारण समीपवर्ती कोशिकाओं से जल, अन्तःपरासरण द्वारा द्वार कोशिकाओं में आने लगता है।

   (9) जल अन्दर आने के कारण द्वार कोशिका में स्फीति दाब बढ़ता है। स्फीति दाब के बढ़ने पर रन्ध्र खुल जाते हैं।
(B) रन्ध्र के बन्द होने की प्रक्रिया (Mechanism of Stomatal Closing)

  रन्ध्र बन्द होते समय निम्नलिखित क्रियाएँ होती     है  —

(1) अन्धकार (रात्रि) में द्वार कोशिकाओं में कार्बन डाइऑक्साइड की सान्द्रता बढ़ जाती है, क्योंकि प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया रुक जाती है जबकि श्वसन की क्रिया होती रहती है, जिससे pH कम हो जाती है।

(2) pH कम होने पर एक संदमक हॉर्मोन एब्सिसिक अम्ल (Abscisic acid, ABA) कार्य करने लगता है, जो K+ आयन को आने से रोकता है तथा जो k+ आयन आ गए थे उन्हें वापस द्वार कोशिकाओं से समीपवर्ती कोशिकाओं में भेजता है।

3) एब्सिसिक अम्ल द्वार कोशिका के अम्लीय माध्यम को और अधिक अम्लीय कर देता है।
 
(4) माध्यम के अम्लीय होने से कार्बनिक अम्ल पुनः मण्ड में परिवर्तित हो जाते है, जिसके द्वार कोशिका की परासरण सान्द्रता कम हो जाती है, जिससे जल बहि: परासरण (exosmosis) द्वारा द्वार कोशिका से बाहर निकल जाता है। 

(5) द्वार कोशिका जब श्लथ हो जाती है तथा रंध्र बन्द हो जाते हैं।

machanism of sometic hybridization

       कायिक संकरण की क्रियाविधि

[Mechanism of Somatic Hybridization]

कायिक संकरण की क्रिया निम्न चरणों में पूर्ण होती है- 
(1) जीवद्रव्यों का पृथक्करण (Isolation of protoplasts),

(2) विलगित जोव का संयुजन (Fusion of isolated protoplasts),

(3) सम्पूर्ण पौधे के पुनर्जनन के लिए संकर जीवद्रव्य का संवर्धन (Culture of hybrid protoplasts to regenerate whole plants) 

(1) जीवद्रव्यों का पृथक्करण (Isolation of Protoplasts)

प्रसिद्ध वैज्ञानिकों गेम्बोर्ग एवं वेटर (Gamborg and Wetter, 1975), पॉवर एवं दवे (Power and Davey, 1979) के अनुसार जीवद्रव्यों का भारी मात्रा में पृथक्करण पादप ऊतकों को उपयुक्त एन्जाइम्स के  घोलों में ऊष्मायन (incubation) द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। यह देखा गया है कि पत्तों के मोजोफिल से जीवद्रव्य तथा कोशिकाओं के निलम्बन कल्चर्स से जीवद्रव्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। 
    यान्त्रिक पृथक्करण (mechanical isolation) विधि द्वारा प्लाज्मोलाइज्ड ऊतक कोशिकाओं की भित्तियों को तेज धार वाले चाकू से काटकर पृथक किया जा सकता है। इस प्रकार निकले हुए जीवद्रव्य में थोड़ी-सी डीप्लाज्मोलाइसिस की क्रिया करनी पड़ती है।
       इस विधि द्वारा निकाले गये जीवद्रव्य की मात्रा कम होती है। दूसरी क्रमबद्ध एन्जाइमेटिक (sequentional enzymatic) विधि में पृथक की गई कोशिकाओं में पेक्टीनेजेज द्वारा पादप ऊतकों में प्रारम्भिक मेसीरेशन किया जाता है और सेल्यूलेज उपचार द्वारा जीवद्रव्यों को परिवर्तित कर दिया जाता है। पॉवर एवं कुकिंग (Power and Cocking, 1961) के अनुसार मिश्रित एन्जाइमेटिक विधि में पादप ऊतकों को पेक्टीनेज तथा सेल्यूलेज एन्ज़ाइम्स के मिश्रण में डीप्लाज्मोलाज्ड किया जाता है, जिससे कोशिका भित्ति कोशिकाओं से पृथक् हो जाती हैं और कोशिकाद्रव्य बाहर निकल जाता है। रियूसिन्क (Ruesink. 1979) के अनुसार मेनीटॉल (manmitol) अथवा सरबिटाल (sorbitol) के घोल को लगभग 0-5 M सान्द्रता पर जीवद्रव्यों को स्थिर (stabilize) रखा जाता है। तम्बाकू तथा पिटूनिया की पत्तियों की मोजोफिल कोशिकाओं से जीवद्रव्य का विलगन, संयुक्तजन एवं संवर्धन की विधियों पर नागाता एवं ताकेबे (Nagata and Takebe, 1970) ने महत्त्वपूर्ण कार्य किये हैं।

चित्र 25.14. पिदुनिया तथा तम्बाकू की मौजोफिल कोशिकाओं से कुकिंग की विधि द्वारा एन्जाइम क्रिया द्वारा जीवद्रव्य का विलगन प्रदर्शित

(A) स्टेरेलाइज्ड पत्ती की सतह,
(B) एन्जाइम घोल ऑस्मोटिक स्टेबिलाइजर के ऊपर तैरते हुए पत्ती के टुकड़े,
 (C) पेट्रीडिश की तली में डूबते हुए पत्ती के टुकड़े,
(D) एन्जाइम घोल को पृथक करना,
(E) धोने वाले माध्यम में जीवद्रव्य,
(F-G)मेन्ट्रीफ्यूज एवं पुनः निलम्बित पोल,
(H-J) सेम्पिल को पृथक करके संवर्धन मीडियम में पुनः निलम्बित करना

(2) विलगित जीवद्रव्यों का संयुजन (Fusion of Isolated Protoplasts)

(1) स्वतः संयुजन (Spontaneous fusion)- एन्जाइम की क्रिया द्वारा कोशिका भित्तियों के गल जाने के फलस्वरूप समीपस्थ जीवद्रव्य आपस में संयोजित होकर होमोकैरियोन्स (homokaryons) का निर्माण करते हैं तथा इन बहुकेन्द्रकीय कोशिकाएँ में वुडकॉक (Woodcock, 1973) के अनुसार 2-40 केन्द्रके पाई जाती हैं। विदर्स एवं कुकिंग (Wahers and Cocking. 1972) के अनुसार कोशिकाओं के मध्य खड़ी हुई प्लाज्मोडेस्मेटा फैलती तथा सिकुड़ती है, जिसके कारण इस प्रकार की अवस्था दिखाई देती है। ब्रार (Brar, 1979) आदि के अनुसार कल्चर की गयी कोशिकाओं में विभाजन के समय इस प्रकार के होमोकैरियोन्स (homokaryons) का अवलोकन जीवद्रव्य पृथक्करण के समय देखा गया।

(2) उत्प्रेरित संयुजन (Induced fusion)- ताजे पृथक् किये गये जीवद्रव्यों को संयुजन के लिए उत्प्रेरित किया जा सकता है। यह क्रिया पाँवर (Power, 1970) आदि के अनुसार फ्यूसोजिन्स जैसे- सोडियम नाइट्रेट (NaNO3) की उपस्थिति में होती है। एरिक्सन (Erikssan, 1971) के अनुसार यह क्रिया कृत्रिम समुद्री जल तथा पोट्रीकस (Potrykus, 1973) के अनुसार यह क्रिया लाइसोजाइम (lysozyme) की उपस्थिति में होती है। निम्नलिखित उपचारों द्वारा कायिक संकर पादपों को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है
      (i) सोडियम नाइट्रेट उपचार (NaNO, Treatment) - सर्वप्रथम कुकिंग (Cocking. 1973) एवं पॉवर (Power, 1970) आदि वैज्ञानिकों ने बताया सोडियम नाइट्रेट (NaNO3) के उपचार द्वारा उत्प्रेरित संयुजन किया जा सकता है। पृथक किये गये जीवद्रव्यों को सुक्रोज ऑस्मोटिकम ( Sucrose osmoticum) पर तैराकर साफ किया जाता है जिसके पश्चात् इन जीवद्रव्यों को 0-25 M सोडियम नाइट्रेट (NaNO3) के घोल में रखकर सेण्ट्रीफ्यूज किया जाता है, जिससे संयुजन विधि शीघ्रतापूर्वक होती है। कार्लसन (Carlson, 1972) आदि वैज्ञानिकों ने इस विधि द्वारा तम्बाकू की दो जातियों जैसे निकोटियाना ग्लॉका (N. glauca) तथा निकोटियाना लेग्सडॉफी (N langadorfi) के जीवद्रव्यों को संयुजित कराकर प्रथम कायिक संकर को प्राप्त किया था।
      (ii) उच्च पी-एच कॅल्शियम आयन उपचार (High pH / Cat Treatment) सर्वप्रथम किलर एवं मिल्चर्स (Killer and Melchers, 1973) नामक वैज्ञानिकों ने इस विधि से तम्बाकू के दो प्रकार के जीवद्रव्यों को संयुजित कराया और यह विधि आजकल भी प्रयोग में लायी जा रही है। पृथक किए गए जीवद्रव्यों को ऊष्मायन 0-4M मेनीटॉल तथा 0-05 M कैल्शियम क्लोराइड जिसका पी-एच मान 10-5 होता है, के घोल को 37 डिग्री सेण्टीग्रेड तापमान पर रखकर किया। इस विधि में जीवद्रव्य 10 मिनट के अन्दर संयुजन करने लगते है। इस विधि द्वारा मिल्चर्स एवं लेबब (Melchers and Labub, 1974) नामक वैज्ञानिकों ने वंश निकोटियाना (Nicotiana) के इंट्रास्पेसिफीक (intraspecific) तथा इंटरस्पेसिफिक (interspecific) कायिका संकरण को प्राप्त किया है।
पेग (PEG) उपचार द्वारा जीवद्रव्यों को तेजी के साथ एक-दूसरे के समीप लाया जा सकता है जिसके फलस्वरूप उनमें संयुजन होता है। दो प्लाज्मा मेम्ब्रेन्स के समुच्चयन के समय दो समीपस्थ जीवद्रव्यों की सतह एक-दूसरे से दबने लगती हैं और दोनों मेम्ब्रेन्स एक-दूसरे से संयुजन करने लगती हैं। इसी समय संयुजन करने वाली मेम्ब्रेन में प्लाज्मोडेस्मेटा जैसे इण्टरकनेक्शन्स दोनों के बीच बन जाते हैं।
     इस प्रकार के जीवद्रव्य धीरे-धीरे फैलकर आपस में संयुजित होकर चौड़े कनेक्शन बना लेते हैं और इसके पश्चात् संयुजन करने वाले अंग पूर्णतया गोलाकार संरचना बना लेते हैं। यह संयुजन दो अथवा दो से अधिक जीवद्रव्यों में होता है। दो असमान जीवद्रव्यों में होने वाली संयुजन के फलस्वरूप हेटेरोकैरियोन (heterokaryon) का निर्माण होता है और जब इनको कल्चर किया जाता है तो हेटेरोकैरियोन की केन्द्रक आपस में संयुजित होकर सत्य संकर कोशिका को जन्म देती है।
    माइक्रोस्पोर जीवद्रव्यों तथा मियोसाइट (meiocytes) जीवद्रव्यों का संयुजन फ्यूसोजिन की अनुपस्थिति
में हो सकता है। इटो (Ito, 1973) नामक वैज्ञानिक ने लिलियेसी कुल (Family Liliaceae) के सदस्यों के
मियोलाइट (mciolyte) जीवद्रव्यों को संयुजित करने के लिए कैविटी स्लाइड्स (cavity slides) का प्रयोग किया है। उन्होंने बताया कि पृथक् किए गए जीवद्रव्यों को स्लाइड के ऊपर धीरे-धीरे थपथपाने से कैविटी के आधार पर उनमें समुच्चयन (aggregation) हो जाता है। कैविटी के आधार में एन्जाइम का घोल भरा होता है, जिससे उनमें संयुजन होता है। चित्र 25.16 में व्यक्तिगत जीवद्रव्यों की संयुजित संरचनाओं को बड़े आकार के आधार पर पहचाना जा सकता है।

(3) संकर जीवद्रव्य का संवर्धन (Culture of Hybrid Protoplast) 
     जब किसी संवर्धन मीडियम में जीवद्रव्य का संवर्धन किया जाता है तो यह देखा गया है कि जीवद्रव्य अपने चारों ओर कोशिका भित्ति का संश्लेषण करके नई कोशिका का पुनर्निर्माण (reconstitute)  करता है।

यह कोशिका लगातार विभाजन करती रहती है जिसके फलस्वरूप कैलस बन जाता है। अधिकांश संवर्धनो में जीवद्रव्य द्वारा कोशिका भित्ति का संश्लेषण होता है। किंतु फेसियोलस (phaseolus)  तथा कपास (Gossypium) के जीवद्रव्य द्वारा कोशिका भिति के निर्माण के लिए संवर्धन मीडियम में अतिरिक्त कैल्शियम क्लोराइड (CaCl2) तथा अमोनियम नाइट्रेट (NH4NO3) को मिला दिया जाता है। इस कार्य में प्रायः नागाता एवं ताकेबे (Nagata and Takebe, 1970) के संवर्धन माध्यम को प्रयोग में लाया जाता है।

जीवद्रव्य संयुजन (Protoplast Fusion)

इस तकनीकी द्वारा विभिन्न लैंगिक अनिषेच्य (sexually incompatible) तथा निषेच्य जनकों से अनेक संकर विकसित किए जा चुके हैं और इस प्रकार के मुख्य उदाहरण निम्न प्रकार है 

(i) Datura innoxia × D. candida
(ii) Solanum tuberosum × Lycopersium esculentum 
(iii) Datura innoxia × Atropa belladona

'लैंगिक संकरण (sexual hybridization) में नर जनक का कोशिकाद्रव्यो महत्त्व बहुत कम होता है। अतः प्रायः मातृक कोशिकाद्रव्यी वंशागति देखने को मिलती है। कायिक कोशिकाओं के जीवद्रव्य के संयुजन द्वारा दोनों जनकों के कोशिकाद्रव्यों के महत्त्व देखने को मिलते हैं। अभी यह ज्ञात नहीं हो सका है कि दोनों कोशिकाद्रव्य आपस में स्थिर होते हैं। एक जाति में क्लोरोप्लास्ट के नष्ट होने की आदत पायी जाती है किन्तु जैव-रासायनिक विश्लेषण के आधार पर यह बताया गया है कि क्लोरोप्लास्ट तथा माइटोकॉण्ड्रिया DNA में प्रयोग में लाने के लिए न्यूक्लिएन प्रोफाइल (nuclease profiles) की आवश्यकता होती है। इस प्रकार की केन्द्रकीय कोशिकाद्रव्यी अवस्थाओं में क्लोरोप्लास्ट DNA व्यक्त नहीं होता है।
       पादप आनुवंशिकता का अध्ययन, केन्द्रकरहित (enucleated) जीवद्रव्य का संयुजन प्रमुख जीवद्रव्य से कराकर मिश्रित कोशिकाद्रव्य वाले साइब्रिड (cybrid) पादपों को प्राप्त किया जा सकता है जिनमें न्यूक्लियर जीन्स केवल एक जाति से आते हैं। पादपों में यह तकनीकी काफी उपयोगी सिद्ध हुई जिसके द्वारा दो लैंगिक अनिषेच्य जनकों (sexual incompatible parents) से भी पौधे प्राप्त किये जा सकते हैं।

Decomposition reaction

0.11 why are decomposition reaction, Called the opposite of Combination reactions ?Write equations for these reactions.

Ans- The Decomposition reactions are opposite to Combination reactions. In a decomposition reaction. A Single Substance to give two or more substances.

Q.11 अपघटन अभिक्रियाओं को संयोजन अभिक्रियाओं के विपरीत क्यों कहते हैं? इन अभिक्रियाओं के लिए समीकरण लिखिए।

Ans- अपघटन अभिक्रियाएँ संयोजन अभिक्रियाओं के विपरीत होती हैं। एक अपघटन प्रतिक्रिया में। एक पदार्थ जो दो या दो से अधिक पदार्थ देता है।

Ribotyping

Rice genome project

Embryo culture

Intellectual property rights